परम पूजनीय स्व. श्री. माधव सदाशिव गोलवलकर (श्री गुरुजी) की स्मृति में समर्पित यह लेख।
इस लेख में गुरु जी का पूरी जीवन परिचय, उनके संघर्षमय यात्रा, संघ परिचय, भारत की आजादी में गुरुजी एवं संघ का महत्व, अंग्रेजी काल में गुरुजी एवं उनके विचार, भारत की स्वतंत्रता एवं संघ पृष्ठभूमि का विशाल पर्वत एवं गुरुजी बाल काल से लेकर अंत जैसे विषयों की लंबी व विस्तृत कड़ी लिखी गई है। अतः बहुत सुबोध और रोचक ढंग से डॉ. हेडगेवार जी के जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंग यहां लिखे गए हैं। यह जितनी मनोरंजन है, उतनी ही उद्बबोधक भी।
यह लेख लंबी व विस्तृत होने के कारण कई भागों में लिखी गई है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य आज देशभर में फैला हुआ है। गांव-गांव में और नगर-नगर में उसकी शाखाएं लगती हैं। संघ का कार्य नदी के प्रवाह जैसा अखंड चल रहा है, बढ़ रहा है, और विभिन्न क्षेत्रों को नवजीवन दे रहा है। जब हम किसी नदी को देखते हैं, तो उसका उगमस्थान देखने की बलवती इच्छा मन में जागती ही है। अपने यहां उसका बहुत अधिक महत्व माना गया है। इसीलिए लोग गंगोत्री, जमनोत्री, अमरकंटक, त्र्यंबकेश्वर आदि स्थानोंपर भक्तिभाव से जाते हैं। यह मनुष्य स्वभाव है।
संघ का विशाल स्वरूप देखने के बाद सहज ही यह जानने की इच्छा होती है कि इसका प्रारंभ कब हुआ ? कैसे हुआ ? कौन है वह भगीरथ जो इस स्वर्गीय गंगा को पृथ्वीपर ले आया ?
१. मंगल दिवस
वह दिन था एक अप्रैल 1889। उस दिन चैत्र शुद्ध प्रतिपदा थी। सर्वत्र उत्साह से नववर्ष का स्वागत हो रहा था। प्रभात की वेला थी। हर घर के आंगन झाड बुहारकर तथा जलसंमार्जन कर केवल स्वच्छ ही नहीं किये गये थे, उन पर महाराष्ट्र की पद्धति के अनुसार सुन्दर रंगावलियां रेखित कर, वे सुशोभित भी किये गये थे। कई लोग दरवाजों पर आम के पत्तों का तोरण बांध रहे थे। बच्चे उनकी सहायता कर रहे थे। कोई नीम की टहनियां ला रहा था। कोई आम के पत्ते ला रहा था। कोई तोरण और बंदनवार बना रहे थे। कोई फूल ला रहे थे और कोई उनके हार बना रहे थे। महाराष्ट्र में वर्षप्रतिपदा को “गुढीपाडवा” कहते हैं। गुढी का अर्थ है ध्वज। उस दिन हर घर आंगन में ध्वज फहराया जाता है और उसका पूजन किया जाता है।
अतः बालक वह सब सामग्री जुटा रहे थे। उनमें कुछ स्पर्धा का भाव भी था। “मेरे घर की गुढी सबसे सुन्दर और ऊंची रहनी चाहिये।” जब गुढी की प्रस्थापना होती तो बालक तालियां पीटते और आनंद से नाचते। आजसब लोग नये कपडे पहनेंगे। हर घर में मीठे पकवान बनेगे। सब ओर आनंद और उत्साह उमड रहा था। नागपुर में पंडित बळिरामपंत हेडगेवार के घर में यह आनंद और अधिक मात्रा में प्रकट हो रहा था। वह पौराणिक तथा ऐतिहासिक दृष्टि से बडा ही यशदायी दिवस था। वह मंगल पर्व था। महत्त्वपूर्ण त्यौहार था। उसी दिन उनके घर में एक बालक का जन्म हुआ था। इस शुभ संयोग की सब लोग सराहना कर रहे थे।
किसीने कहा – “कितने अच्छे मुहूर्त पर इस बालक का जन्म हुआ है। यह आगे चलकर अवश्य ही कोई बडा पराक्रम करेगा।” दूसरे ने कहा – “वर्ष प्रतिपदा तो विजय-दिवस है। शतकों पूर्व, इसी दिन, सम्राट शालिवाहन ने, आक्रमणकारी शकों को मार भगाया था। उसी की स्मृति में हम यह ध्वजोत्तोलन करते हैं। कहा जाता है कि उसके पास न खजाना था, असेना थी, और न कोई अधिकार था। परंतु वह अपने देश की दुर्दशा से व्यथित था, और ईश्वरी शक्ति से प्रेरित था। उसने मिट्टी के घुडसवार और सैनिक बनाए। फिर उनमें प्राण फूंके और उनके भरोसे परचक्र का निवारण किया। मुझे लगता है,
यह बालक भी वैसा ही कुछ न कुछ असाधारण करतब कर दिखायेगा।” किसी ने कहा, “यह हेडगेवार वंश की कीर्तिध्वजा ऊंची फहराएगा। देशभर में अपने घराने का नाम चलाएगा। “इस प्रकार, अनेक शुभकामनाओं के साथ, उस बालक का सबने बहुत प्रेम से स्वागत किया। बारहवें दिन नामकरणविधि संपन्न हुआ। बालक का नाम केशव रखा गया।
2. वंश-परिचय
आंध्रप्रदेश के निजामाबाद जिले की बोधन तहसील में कंदकुर्ती नाम का एक ग्राम है। गोदावरी, हरिद्रा और वनजरा इन तीन नदियों के संगमपर वह बसा हुआ है। यहीं पर हेडगेवार परिवार प्राचीनकाल से रहता था। यह परिवार विद्याध्ययन तथा पाण्डित्य के लिए विशेष प्रसिद्ध था। सन् १८०० ईसवी के बाद इस कुल की एक शाखा नागपुर में आयी। इसी शाखा में केशव का जन्म हुआ। केशव के पिता का नाम बळिराम था और माता का नाम रेवती। केशव के दो भाई थे और तीन बहनें थीं। बडे भाई का नाम महादेव था। मंझले का सीताराम था और केशव सबसे छोटा था।
पंडित बळिरामजी बहुत विद्वान थे। उन्होने अग्निहोत्र का व्रत लिया हुआ था। वे वेदों का पठन-पाठन करते थे और पौरोहित्य कर परिवार की उपजीविका चलाते थे।
उनके बडे पुत्र महादेव शास्त्री विद्वत्ता के साथ साथ अपने शारीरिक बल के लिए भी प्रसिद्ध थे। वे प्रतिदिन व्यायामशाला में जाते थे और हजार-हजार डंड बैठकें लगाते थे। वे कुश्ती में पारंगत थे और मलखंब से उन्हें विशेष प्रेम था। वे अपने साथ मुहल्ले के बच्चों को व्यायामशाला में आग्रहपूर्वक ले जाते थे और उनहें बड़ी लगन से कुश्ती, मलखंब इत्यादि सिखाते थे।
उनका स्वभाव तेज था। कहते हैं कि एकबार वे अपने मकान की दूसरी मंजिल पर गैलरी में खड़े थे। नीचे सडक पर कुछ गुंडे थे। उनमें से किसी ने सडक से जा रही स्त्रियों को छेडने का प्रयत्न किया। यह देखते ही महादेव शास्त्री आगबबूला हो गये। । उन्होने उन गुंडों को वहीं से ललकारा और वे धडाम से नीचे कूद पड़े। वे उनसे अकेले लडते रहे और एक-एक को पकडकर पीटते रहे। जब मुखिया की हड्डी नरम हुई, तो बाकी सब नौ-दो-ग्यारह हो गये। फिर उस मोहल्ले में कभी किसीने ऐसा अभद्र व्यवहार नहीं किया। नगर के उस भाग में महादेव शास्त्री का बडा नाम था, और रौब था।
महादेव शास्त्री को केशव से विशेष प्यार था। वे अपने साथ प्रतिदिन केशव को व्यायामशाला में ले जाते थे और उसे डंड, बैठक, कुश्ती, मलखंब, लाठी, बनेठी इत्यादि सिखाते थे।
माता-पिता का छाया-छत्र केशव के भाग्य में नहीं था। सन् १९०२ ईसवी में नागपुर में सर्वत्र प्लेग का प्रकोप हुआ। अपने स्वभाव के अनुसार पंडित बळिरामजी हर किसी के घर जाते थे और लोगों की सहायता करते थे। अंत में हुआ यह कि वे स्वयं भी बीमार हुए और उनकी पत्नी रेवती भी बीमार हुई। दोनों प्लेग के शिकार हुए और एक ही दिन परलोक सिधारे। उस समय केशव की आयु केवल बारह वर्ष की थी।
३. बुद्धिमान बालक
केशव एक बुद्धिमान बालक था। उसकी स्मरणशक्ति असाधारण थी। रामरक्षा स्तोत्र और समर्थ रामदास स्वामी विरचित मनोबोध के श्लोक उसने अल्पसमय में कण्ठस्थ कर लिए। जब वह गीता के अध्याय और अनेक संस्कृत स्तोत्र अपने सुस्पष्ट वाणी से सुनाता था, तब बडे लोग भी चकित हो जाते थे। अपने बडे भाइयों के साथ वह नित्यप्रति महाभारत, रामायण इत्यादि सुनने के लिए जाता था और ध्यानपूर्वक सुनता था। हर कथा का मर्म वह तत्काल ग्रहण करता था। छत्रपति शिवाजी महाराज की कथाएं सुनने में तथा पढने में उसे विशेष रुचि थी। उन्हें सुनते-सुनते तथा पढते-पढते वह लवलीन हो जाता था। एक बार केशव के यहां एक रिश्तेदार बाहर गांव से आये। वे कथा सुनाने की कला में प्रवीण थे। उन्होने शिवाजी के बाल्यजीवन की एक कथा सुनाई। केशव उनका कथाकथन तन्मय होकर सुन रहा था। कथा जब समाप्त हुई तब अन्य बालक उठकर इधर-उधर चले गये। परन्तु केशव वहीं पर बैठा रहा। मन ही मन वह शिवाजी के काल में पहुंच गया था। कथा के सब प्रसंग उसकी आंखों के सामने घटित हो रहे थे। शिवाजी के सामंत पिता शहाजी, बाल शिवाजी को लेकर बीजापुर के आदिलशाह के दरबार में पहुंचे। शहाजीने कहा- “मेरे प्रिय कुमार, प्रणाम करो, शहंशाह को प्रणाम करो।” तब बाल शिवाजी ने तनकर कहा – “नहीं, कभी नहीं। न ये हमारे समाज के हैं, न देश के, न धर्म के। इन्हें मैं कभी प्रणाम नहीं कर सकता।”
इसी समय किसीने केशव को पुकारा परंतु वह उत्तर न दे सका। जब पास आकर, कन्धा पकडकर, केशव को हिलाया गया, तब कहीं वह इतिहासकाल से वर्तमानकाल में आ गया। इस छोटी आयु में ही केशव के मन में अपने देश के संबंध में विचार उठने लगे थे।
4. वह मिठाई खाना पाप है
बच्चों को मीठे पदार्थों का बडा आकर्षण रहता है। अनेक बालक मिठाई के लिए हठ पकडते हैं और रोते हैं। पर आश्चर्य की बात यह, कि बालक केशव ने, उस दिन उसे प्राप्त हुई मिठाई नाली में फेंक दी। बात ऐसी हुई – उस समय भारतवर्ष पर अंग्रेजों का राज था। उनकी रानी राज कर रही थी। उसका नाम था विक्टोरिया। जब उसके राजकाल के साठ वर्ष पूर्ण हुए, तब अंग्रेजों ने साम्राज्य भर में बडा समारोह सम्पन्न किया। हिन्दुस्थान में भी अंग्रेजों ने उसे धूमधाम से मनाया। स्थान-स्थान पर बडी-बडी दावतों का आयोजन किया गया। विशाल सभाएं हुईं। उनमें लंबे-चौडे भाषण देकर रानी को हर प्रकार से सराहा गया। सडकों पर कमानें बंधवाईं। ध्वजा-पताका तोरण आदि बांधकर सडकें सजायी गयीं और रानी के चित्र के जुलूस निकाले गये। इस समारोह के उपलक्ष्य में शालाओं में बच्चों को मिठाइयां बांटी गयीं। केशव की पाठशाला में भी बच्चों को मिठाई दी गयी। वह नन्हें केशव को भी प्राप्त हुई। पर उस मिठाई को छूते ही केशव को ऐसी वेदना हुई जैसे उसे बिच्छू ने डंक मारा हो। उसके छोटे से मस्तिष्क में इस प्रकार विचारचक्र चलने लगा – “अंग्रेज लोग न हमारे देश के हैं, न हमारे धर्म के। न मालूम कितनी दूर से वे यहां आये हैं और हम पर राज करते हैं। उन्होने हमें गुलाम बनाया है। वे हमारे शत्रु हैं। उनकी रानी को राज्य करते हुए साठ साल बीते, इसलिए हम खुशी क्यों मनाएं ? हम मिठाइयां क्यों खायें ? छिः छिः ! इस मिठाई को खाने का अर्थ है अंग्रेजों के राज्य को मान्यता देना। उनकी गुलामी में आनंद मानना। इस मिठाई को खाना पाप है। इस मिठाई को खाना अपने देश के प्रति द्रोह करना है। नहीं, नहीं। मैं यह मिठाई कभी नहीं खाऊंगा।” जब विचारों में तीव्रता आ गयी तब केशव ने झट से हाथ उठाया और मिठाई नाली में फेंक दी। उसके सहपाठी उसकी इस कृति को देखते ही रह गये। केशव ने उन्हें अपनी बुद्धिनुसार बहुतेरा समझाया। पर केशव की बातें उनकी समझ में नहीं आयीं। केशव जब घर आया तब उसकी मुखचर्या कुछ उग्र सी थी। उसे देख बडे भैया ने पूछा, “क्या बात है ? कुछ नाराज से दिखते हो। सुनते है आज पाठशाला में मिठाई बंटी। क्या तुम्हें नहीं मिली ?”। केशव ने कहा- “मिली क्यों नहीं? पर मैने वह नाली में फेंक दी।” तब पास में खडे एक रिश्तेदार ने कहा “वाह भाई वाह, यह भी कोई बात है ? मिठाई कहीं भला नाली में फेंकी जाती है ?” केशव ने तपाक से उत्तर दिया, “अजी, वह मिठाई की नहीं, विष की पुडिया थी। जिन्होने हमें गुलाम बनाया है, उनकी रानी के समारोह में हम क्यों कर सहभागी होगे ? ऐसी ही मिठाई दे-देकर अंग्रेज हमें सदा के लिए गुलाम बनाये रखना चाहते हैं।” केशव का वह आवेश देखकर सुननेवाले सब चकित हो गये। एक ने कह ही दिया – “भाई, यह मामूली लडका नहीं है। इसका पानी कुछ अलग ही है।”
5. दुर्ग जीतने की इच्छा
छत्रपति शिवाजी महाराज की कथा सुनते समय बालक केशव कई बार मन ही मन उसकी सेना का एक सैनिक बन जाता था। कभी वह घुडसवार होकर सरपट घोडा दौडाता, तो कभी किसी दुर्गपर आक्रमण करता। कभी गुप्तमार्ग से अकस्मात किले में पहुंचता, और किला जीत लेता। प्रत्यक्ष जीवन में भी इसी प्रकार का प्रयत्न करना चाहिए, ऐसा उसे लगता था। नागपुर नगर के मध्य में एक छोटासा दुर्ग है। उसे “सीताबर्डी” का किला कहते हैं। उन दिनों में उस किले पर अंग्रेजों का ध्वज फहराता रहता था। उसे देखकर केशव को बडी पीडा होती थी। वह अपने मित्रों से कहता था, “यह अंग्रेजों का झंडा हमें वहां से उखाड फेंकना चाहिए। किसी प्रकार यह सीताबर्डी किला हमें जीतना चाहिए और वहां पर भगवा ध्वज लहराना चाहिए।” एक मित्र ने कहा- “किसी प्रकार यदि हम भीतर पहुंच जायं तो वहां के अंग्रेज सैनिक को मारकर या भगाकर, हम किला जीत सकते हैं।”
“परन्तु हम वहां पहुंच कैसे पायेगे?” दूसरे ने शंका उपस्थित की। तीसरे ने उपाय बताया, “क्यों न हम सुरंग खोदें? जमीन के भीतर ही
भीतर से किले में पहुंचने का मार्ग तैयार किया जाय।”
“चलो, हम अभी प्रारंभ करें। अच्छे काम में सुस्ती नहीं होनी चाहिये।”जहां ये बालक खेला करते थे उसके पास में ही वझे गुरुजी का मकान था। उसका बहुत बडा आंगन था। चारों और परकोटा खींचा हुआ था। वझे गुरुजी के घर के लोग बाहरगांव गये हुए थे। जब वझे गुरुजी पाठशाला जाते थे, तब बाडे में सब सुनसान रहता था। वही स्थान योग्य माना गया। सबने अपने-अपने घर से खुदाई करने का सामान लाया। कोई कुदाली ले आया तो कोई फावडा । कोई सब्बल तो कोई टोकनियां उठा लाया। बाल देशभक्तों को यह कार्य चुपचाप चलने लगा। वझे गुरुजी के घर के आंगन में एक बडा भारी गड्ढा निर्माण हो गया। शाम को जब वझे गुरुजी घर आये, तब बालकों का यह उद्योग देखकर चकित रह गये। उन्होने एक-दो को एक ओर बुलाकर पूछा कि ये सब क्या हो रहा है? किसलिए हो रहा है ? तब उन बालकों ने अत्यंत सरलता से अपनी सब योजना बतायी। उन छोटे-छोटे बालकों की भोली कल्पनाएं सुनकर वझे गुरुजी को हंसी आयी परंतु बालकों की तेजोमय आकांक्षाएं देखकर आनंद भी हुआ। उन्होने सब बालकों को एकत्रित कर पास में बिठाया और ठीक ढंग से समझाया। केशव उन सब बालकों का अग्रणी था। उन्होने केशव की विशेष रूप से सराहना की और उसे आशीर्वाद दिया- “तुम आगे चलकर देश की उत्तम सेवा करोगे।”
६. अंग्रेजी राज का नमूना
भेद उत्पन्न करने की अंग्रेजों की नीति थी। लोगों में आपसी झगडे लगा देना और खुद उसका लाभ उठाना, ऐसी उनकी रीति थी। इसी दुष्ट हेतु को मन में रखकर अंग्रेजों ने सन् १९०५ में बंगाल प्रान्त के दो भाग करने का निश्चय किया। बंगाल प्रान्त के नेताओं ने इसके विरुद्ध आम जनता को जागृत किया। सब लोग क्रुद्ध हो गये। सभाएं होने लगीं। जुलूस निकलने लगे। घोषणाएं होने लगीं, “नहीं, हम बंगाल के टुकडे नहीं होने देगे।” बंकिम बाबू का वंदेमातरम् गीत राष्ट्रगीत बन गया। वंदेमातरम् के उच्चारण मात्र से लोगों में नवचैतन्य उत्पन्न होने लगा। वह आन्दोलन केवल बंगाल का नहीं रहा। भारतवर्ष के कोने-कोने से “वंदेमातरम् की ध्वनि गूंजने लगी और लोग कहने लगे, “नहीं, हम बंगाल के टुकडे नहीं होने देगे। यह केवल बंगाल का प्रश्न नहीं हैं, सम्पूर्ण देश का प्रश्न है। वंदेमातरम् । भारत माता की जय।”
इस प्रकार के विचार सुनकर और घोषणाएं सुनकर, अंग्रेज अधिकारी चिढने लगे। वे जुल्म ढाने लगे। जबरदस्ती करने लगे। अन्यायपूर्ण आदेश देने लगे। उन्होने कहा कि, “जो भी भारत माता की जय कहेगा, उसे कडी सजा दी जायेगी।”परन्तु देशभक्ति की लहर अंग्रेजों के रोके रुकी नहीं। वह सुदूर ग्रामों एवं नगरों में पहुंची। भावनाशील केशव उससे बहुत प्रभावित हुआ।
7. सीमोल्लंघन
सन् 1907 ईसवी के अक्तूबर मास की घटना है। सर्वत्र लोकमान्य तिलक के भाषण गूंज रहे थे। स्वदेशभक्ति की हवा देश भर में बह रही थी। ऐसे वातावरण में विजयादशमी को अर्थात् दशहरे के त्यौहार पर, केशव अपने चाचा श्री आवाजी हेडगेवार के पास रामपायली में पहुंचा। केशव की विशेषता यह थी कि वह जहां भी जाता था, अपने समवयस्कों को बहुत प्रभावित करता था। वे सब अल्पकाल में ही उसके मित्र ही नहीं, अनुयायी बन जाते थे। रामपायली में भी यही हुआ। बहुत बडी संख्या में उसने वहां मित्र जुटा लिये। सबसे विचार-विनिमय करने के बाद, उसने दशहरा मनाने के संबंध में एक विशेष योजना बनायी। महाराष्ट्र में दशहरे का त्यौहार विशेष ढंग से और बडे उत्साह से मनाया जाता है। उस दिन नये कपडे पहनकर सब लोग गांव की सीमा के बाहर जाकर “सीमोल्लंघन” करते हैं। वहां पर शमीपूजन होता है। रावण का पुतला जलाया जाता है। शमी और आपटा वृक्ष के पत्तों को उस दिन सोना कहते हैं। जैसे सचमुच रावण को मारकर लंका से सोना लूटकर लाया हो, इस ढंग से, सब लोग घर-घर जाते हैं, बडों के पैर छूते हैं, उन्हें ‘सोना’ देते हैं और मिठाईयां खाते हैं। रामपायली में दशहरे के दिन शाम को, जब लोग सीमोल्लंघन के लिए जाने लगे तब उनके साथ केशव भी था और उसके मित्र भी थे। नित्य की प्रथा के अनुसार जब शमीपूजन हुआ और लोग रावण के पुतले की ओर बढने लगे तब केशव जोर से गरज उठा, “वंदेमातरम् !” तब उसके सब मित्र और उनके साथियों ने भी गर्जना की, “वंदेमातरम् !” एकाएक वहां का वायुमंडल मानों बदल गया। सब लोग अपने अंतःकरण में नवचेतना का अनुभव करने लगे। सामने एक छोटासा टीला था। केशव उसपर जाकर खडा हुआ और सबको संबोधित कर उसने कहा- “आज हमें अनेक प्रकार की सीमाओने कसकर बांध रखा है। उन्हें पार करना हमारा कर्तव्य है। हमे आज पारतंत्र्य, कायरता, अज्ञान और निपट स्वार्थ ने घेर रखा है। इस घेरे को हमें तोडना होगा। रावण प्रतिनिधित्व करता है अन्याय का, जुल्म-जबरदस्ती का, क्रूर साम्राज्यवाद का, और कुटिल राज्यकर्ताओं का। उसे हमें जलाना होगा। यह पवित्र देशकार्य है, देवकार्य है। बोलिये “वदेमातरम् । भारतमाता की जय !”
सब लोगों में आवेश आ गया। बालक और किशोर तेजी से आगे बढ़े।”रावण” को तोडा, फोडा तथा जलाया गया। प्रभु रामचंद्र और भारत माता की
जय-जयकार करते हुए सब लोग अपने-अपने घर लौटे।
इस प्रकार उस वर्ष रामपायली की जनता को केवल पेड के पत्तों का नहीं, नव-विचारों का “सुवर्ण” प्राप्त हुआ। उस वर्ष रामपायली की जनताने पुरानी सीमाएं लांघकर वास्तव में सीमोल्लंघन किया।
8. वंदेमातरम्
अंग्रेजों ने देशभर में तरह-तरह के अन्यायपूर्ण कानून लागू किये थे। यहां तक कि शालाओं में पढनेवाले कोमल विद्यार्थियों को भी उन्होने बंधनों में जकडने से छोडा नहीं था। लोकमान्य तिलक जैसे महापुरुषों के व्याख्यान सुननेपर विद्यार्थियों को मनाही थी। देशभक्ति के विचारों का प्रचार करनेवाला समाचारपत्र पढना उनके लिए मना था। पूरा राष्ट्रगीत गाना तो दूर की बात, विद्यार्थी केवल ‘वंदेमातरम्’ भर कह दें तो वह बडा भारी अपराध माना जाता था। इन पाबन्दियों को तोडने पर विद्यार्थियों को बेतों से मार पडती थी तथा उन्हें अन्य सजाएं भी दी जाती थीं। उस समय केशव की आयु केवल चौदह वर्षों की थी। वह नागपुर के नील सिटी हायस्कूल का विद्यार्थी था। अंग्रेज अधिकारियों की अन्यायपूर्ण करतूतें वह आये दिन सुनता था और उसके हृदय में तूफान उठता था। फलस्वरूप उसने अपने मित्रों को जुटाकर एक योजना बनायी। हो-हल्ला मचाये बिना, हर कक्षा के प्रमुखों तक बात पहुंची, और उन्होने अपने साथियों को बतायी। सबने दृढता के साथ निश्चय किया- “हां, ऐसा ही होगा।” शाला-निरीक्षक अधिकारी निरीक्षण कार्य के लिए विद्यालय में आनेवाले थे। सर्वप्रथम वे केशव की ही कक्षा में आये। उन्होने दरवाजे में पैर रखा ही था कि सब विद्यार्थी उठ खडे हुए और उन्होंने एक स्वर में कहा – “वंदेमातरम्।” तब दूसरी कक्षा भी ललकार उठी- “वंदेमातरम्।” फिर हर कक्षा से “वंदेमातरम्” की गर्जना होने लगी। संपूर्ण पाठशाला में यही ध्वनि गूंजने लगी, “वंदेमातरम्।”शाला-निरीक्षक का कार्य वहीं रुक गया। अधिकारी क्रोध के मारे आग- बबूला हो गये। वे झल्लाये – “इस बेवकूफी की जड में कौन है? पता लगाओ। सबको कड़ी सजा दो। यह सब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।” शालासंचालक घबरा गए-त-त-प-प करने लगे। जी हुजूर, जी हुजूर करने लगे। उन्होंने मुख्याध्यापक से कहा- “कौन है इसकी जड में, पता लगाओ। यह सब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। अपराधी को कडी सजा दी जावेगी।” मुख्याध्यापक ने शिक्षकों से कहा- “कौन है इसकी जड में, पता लगाओ, यह सब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। अपराधी को कडी सजा दी जावेगी।”
आंखों से अंगारे बरसाते हुए निरीक्षक महोदय चले गये। मुख्याध्यापक महोदय हाथ में बेंत लेकर सब दूरघूमने लगे। हर कक्षा से शिक्षक हर विद्यार्थी से पूछने लगे। “सच बताओं, किसने यह सब बवंडर खडा किया, इसके मूल में कौन है?” शिक्षकों ने हर प्रकार से प्रयत्न किये। डराया, धमकाया, ललचाया, पुचकारा, थप्पडें मारीं, बेंत मारे, परन्तु किसी ने भी भेद नहीं खोला। किसी ने भी अपने नेता का नाम नहीं बताया। अन्त में शिक्षक हताश हो गये। मुख्याध्यापक कहने लगे, सबको स्कूल से निकाल दिया जावेगा। तब “वंदेमातरम्” की घोषणाएं देते हुए विद्यार्थी शाला छोडकर चले गये। मुख्याध्यापक महोदय कठोर भाषा बोलने लगे तब विद्यार्थियोने विद्यालय में जाना बंद कर दिया। उस समय देश की परिस्थिति ऐसी थी कि यह विद्यार्थियों का निश्चय अधिक काल टिक न सकता था। पालकों पर और पिताओं पर दबाव आने लगा। अधिकारियों ने हर प्रकार की चालबाजी का अवलंब करते हुए, पालकों को अपने पाल्यों को क्षमा मांगकर विद्यालय में भेजने के लिए बाध्य किया। एक-डेढ मास के बाद प्रायः सब विद्यार्थी फिर से विद्यालय में जाने लगे। अर्थात् केशव का अपवाद था। केशव उस शाला में नहीं गया। केशव ने कहा, “मैंने कोई अपराध नहीं किया है। मैं क्षमा नहीं मांगूंगा। मौखिक माफी भी नहीं मांगूंगा।
9. ऐसे शासन को उखाड़ फेंको
इस घटना के बाद कुछ दिन तक केशव नागपुर में ही रहा। अडोसी- पडोसी और नाते-रिश्ते के लोग उसे शाला में जाने का उपदेश देने लगे। एक ने कहा- “उसमें कौनसी बडी बात है? बस ! माफी मांग लो, और शाला में जाने लगो।” केशव ने कहा- “क्यों ? मैं माफी क्यों मांगू? मैंने कौनसा अपराध किया है?” वे महोदय बोले, “क्यों? तुमने वंदेमातरम् नहीं कहा ? औरों को कहने के लिए नहीं सिखाया ? यह अपराध ही तो है।” केशवने कहा – “क्या, अपनी मां को प्रणाम करना भी कभी अपराध हो सकता है?” उक्त महोदय ने कहा “जी हां, जब शासन ने उसे अपराध माना है, तब वह अपराध ही है।” तब केशव ने दृढता के साथ खनकती हुई वाणी में कहा “मैं ऐसे शासन को नहीं मानता। ऐसा अन्यायी शासन हमें उखाड़ फेंकना होगा।” केशव के वे तेजस्वी शद्व सुनकर वे महोदय देखते ही रह गये। वहां पर जो भी लोग खडे थे, सब मन ही मन घबरा गये। उनमें से एक ने कहा, “ना बाबा, ऐसे लडके से न बोलना ही अच्छा है; नहीं तो किसी दिन अपने पर भी उलटी-सीधी बीत सकती है।” दूसरे ने कहा- “अजी ये आजकल के बच्चे, कहीं से कुछ सुन लेते हैं और वही बकने लगते हैं।” रिश्तेदारों ने भी इसी ढंग का उपदेश दिया। तब केशव ने उन्हें भी इसी प्रकार के उत्तर दिये। फिर केशव को कुछ दिनों के लिए उसके काका के पास रामपायली भेज दिया गया। वहां पर एक दिन एक सज्जन उसे कहने लगे “बेटा, तुम तो अभी बहुत छोटे हो। इस उम्र में तुम्हें पढाई में ही ध्यान जुटाना चाहिए। इस कच्ची आयु में यह देशभक्ति का उद्योग तुमने क्यों अपनाया है ?” केशव ने उन्हें तपाक से जबाब दिया, “आपने इस उद्योग को अपनाया नहीं है, इसलिए यह मुझे करना पड रहा है। शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद, कितने लोग देशहित का ध्यान रखते हैं? आपकी शिक्षा तो पूरी हो गयी है? आपकी उम्र भी पकी है। फिर आप क्यों नहीं देशसेवा का व्रत लेते ? यदि आप इस कार्य को करने का बीड़ा उठाते हैं तो मैं भी विद्यालय की शिक्षा पूरी करने का वादा करता हूं।” उक्त सज्जन निरुत्तर हो गये। उन्होने जाना कि यह कशोर उसे हम कितना भी समझायें, वह अपनी जिद नहीं छोड सकता।
१०. धमाका
एक दिन छोटे से रामपायली में बहुत बडी धूम मची। रात्रि का समय था। नौ बज रहे होगे। पुलिस थाने में सिपाही लोग कुछ सुस्ताये, कुछ मस्ताये, इघर- उधर की गप्पें हांक रहे थे। तब एकाएक धमाका हुआ। धडाड-धम् की आवाज से सब लोग चौंक उठे।
सिपाही घबराये कि क्या हुआ, और कहां हुआ ? आसपास के घरों में रहनेवाले भयचकित नेत्रों से झांकने लगे कि क्या हुआ? कहां हुआ? पुलिस के अधिकारी आ पहुंचे। दौडधूप शुरू हो गयी। निरीक्षण-परीक्षण आदि का दौर चलने लगा। पुलिस थाने की बाहरवाली दीवार में एक छेद हो गया था। पास में ही नारियल की खपच्चियां पडी थीं। वहां पर बारुद की गंध फैल रही थी। कुछ छोटी कीलें और कांच के टुकडे बिखरे पडे थे। कानाफूसी होने लगे। दबी आवाज में लोग बोलने लगे। उस छोटे से गांव में वही एक आमचर्चा का विषय हो गया। “क्यों भाई, कल रात एकाएक धमाका कैसे हुआ ? आसपास के जंगलों में कोई शिकारी आये थे क्या”। “अजी, जानते नहीं हो ? इतना गजब हुआ और आपको पता तक नहीं? कल रात्रि किसी ने पुलिस थाने की दीवार पर ही बम फेंका। पुलिस अधिकारियों ने बहुत खोजबीन की, पर पता नहीं लगा।”
“मतलब यह कि हमारी रामपायली में भी क्रांतिकारियों का कार्य चल रहा है।” “अजी, धीरे से बोलिये। कोई सुन लेगा तो हम पर भी व्यर्थ में संकट आ सकता है।”
चारों ओर भय छा गया। लोगों ने एक-दूसरे से मिलना-जुलना, बोलना बंद कर दिया। पुलिस के अधिकारियों ने कुछ पकड-धकड की। कुछ लोगों को मारा-पीटा भी। परंतु वे कोई भी सुराग नहीं पा सके। परंतु बिना किसी के कहे, केशव के चाचाने, अर्थात् आबाजी हेडगेवार ने यह समझ लिया कि यह कार्य अपने भतीजे का ही है। पुलिस के अधिकारियों के मन में शंका उत्पन्न होने के पूर्व ही आबाजी ने केशव को चुपके से नागपुर भेज दिया। थोडे ही दिनों में केशव ने नागपुर भी छोडा। डाक्टर बालकृष्ण शिवराम मुंजे से परिचयपत्र लेकर वह यवतमाल पहुंचा।
लेख की इस भाग में इतना हीं, बाकी अन्य विषय गुरु जी की यवतमाल विद्यालयीयात्रा , गुरु जी को डाक्टर बनने का निश्चय एवं अन्य विषय लेख के अगले भाग में प्रकाशित किया जाएगा।
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