बिहार के नए राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान और मुस्लिम समाज के मुद्दे :

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में 18 नवंबर 1951 को जन्मे आरिफ़ मोहम्मद ख़ान अस्सी के दशक के बाद से ही सुर्खियों में बने रहे. उन्होनें बीए (ऑनर्स) अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) और एलएलबी लखनऊ विश्वविद्यालय से किया. वो एएमयू स्टूडेंट यूनियन के महासचिव और अध्यक्ष रहे। 1977 में वो बुलंदशहर की स्याना सीट से विधायक चुने गए. इसके बाद वो सातवीं, आठवीं, नौवीं, और बारहवीं लोकसभा में सांसद रहे।

‘टेक्स्ट एंड कॉन्टेक्स्ट : कुरान एंड कंटेम्पररी चैलेंजेस’ किताब के लेखक आरिफ़ मोहम्मद ख़ान राजीव गांधी और वीपी सिंह सरकार में ऊर्जा, नागरिक उड्डयन सहित कई मंत्रालयों के मंत्री रहे। साल 1986 के चर्चित शाह बानो केस मामले में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार से आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने इस्तीफ़ा दे दिया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तलाक़ लेने वाली मुस्लिम महिलाओं को इद्दत का समय गुज़ारने के बाद भी गुज़ारा भत्ता मिलने के हक़ में फ़ैसला सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला पलटने के लिए राजीव गांधी सरकार संसद में विधेयक लाई थी और इसका विरोध आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने किया. बाद में वो 1989 में जनता दल से और 1998 में बहुजन समाज पार्टी से सांसद रहे। साल 2004 में वो बीजेपी में शामिल होकर चुनाव लड़े, लेकिन वो जीते नहीं. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के पूर्व प्रोफ़ेसर पुष्पेन्द्र कहते हैं, “आरिफ़ मोहम्मद ख़ान इस्लामिक स्कॉलर हैं और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के लिए वो पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की परंपरा वाले और ‘अच्छे मुसलमान’ की परिभाषा के खाके में फिट बैठने वाले हैं. वो बीजेपी के लिए ऐसा चेहरा बन गए हैं जिनकी पहचान मुस्लिम कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ बोलने वाले की है. बीजेपी ऐसा करके बिहार के मध्यम वर्ग मुसलमानों को टारगेट कर रही है जो वर्तमान स्थिति में सामंजस्य बैठाने की कोशिश कर रहे हैं।”

* केरल जैसे हालात नहीं बनेंगे- केसी त्यागी

दरअसल मुस्लिम समाज के एक हिस्से में आरिफ़ मोहम्मद ख़ान की छवि सुधारवादी की है और उन्हें बीजेपी के एजेंडे को लागू करने में एक सहायक की भूमिका निभाने वाले के तौर पर देखा जाता है।अनुच्छेद 370, तीन तलाक़ और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर आरिफ़ मोहम्मद ख़ान बीजेपी के रुख़ का ही खुलकर समर्थन करते रहे हैं। केरल में बतौर राज्यपाल उनकी नियुक्ति भी वामपंथ के गढ़ को ढहाने की कोशिश के तौर पर देखी गई थी. यहां का राज्यपाल रहते हुए आरिफ़ मोहम्मद ख़ान को पिनराई विजयन सरकार के साथ हमेशा विवाद रहा।

क्या बिहार में ऐसे हालात बन सकते हैं? इस पर जेडीयू के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद केसी त्यागी ने बीबीसी से कहा, “1974 में जब लोकदल बना तभी से नीतीश कुमार और आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने साथ काम किया है. इस कारण यहां केरल जैसे हालात नहीं बनेंगे।”

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