मोहन भागवत की चेतावनी को भी अनसुना कर दिया RSS की पत्रिका ने?

ऑर्गेनाइजर की कवर स्टोरी और इसके संपादकीय में कहा गया है कि भारत के मुस्लिम समुदाय के लिए यह जरूरी है कि वह आक्रांताओं द्वारा हिंदुओं के साथ किए गए ‘ऐतिहासिक अन्याय’ को स्वीकार करे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत के द्वारा मंदिर-मस्जिद विवादों को लेकर हाल ही में दिए गए एक बयान पर राजनीतिक बयानबाजी गर्म है। कई हिंदू धर्म गुरुओं ने संघ प्रमुख के बयान पर नाराजगी जताई है तो उर्दू अखबारों ने लिखा है कि संघ प्रमुख को सिर्फ चिंतन करने के बजाय संघ के स्वयंसेवकों पर लगाम लगानी चाहिए। इस सबके बीच, संघ के मुखपत्र ऑर्गेनाइजर ने भी इस मामले में कवर स्टोरी प्रकाशित की है और संपादकीय भी लिखा है।

क्या कहा था भागवत ने?

मोहन भागवत ने संभल की शाही जामा मस्जिद से लेकर अजमेर शरीफ दरगाह और ऐसे ही कई मामलों को लेकर कहा था कि हर दिन इस तरह के मुद्दों को उठाने को स्वीकार नहीं किया जा सकता। भागवत ने यह भी कहा था कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के बाद से कुछ लोगों को यह विश्वास होने लगा है कि वे इस तरह के मुद्दों को उठाकर “हिंदुओं के नेता” बन सकते हैं। संघ प्रमुख भागवत ने बीते गुरुवार को पुणे में हिंदू सेवा महोत्सव में यह बयान दिया था। भागवत ने एक “समावेशी समाज” की वकालत की थी।‘सभ्यतागत न्याय’ की बात कही

संघ से जुड़ी पत्रिका ऑर्गेनाइजर के ताजा संपादकीय में कहा गया है कि विवादित स्थलों और पुराने स्ट्रक्चर का सही इतिहास जानना ‘सभ्यतागत न्याय’ के लिए बेहद जरूरी है। पत्रिका में संभल के जामा मस्जिद विवाद मामले में कवर स्टोरी छापी गई है। इस कवर स्टोरी में दावा किया गया है कि संभल में शाही जामा मस्जिद की जगह पर मंदिर मौजूद था। स्टोरी में संभल में पिछले सालों में हुई सांप्रदायिक घटनाओं का भी जिक्र किया गया है। अहम बात यह है कि कवर स्टोरी और संपादकीय में मंदिर-मस्जिद विवाद को लेकर संघ प्रमुख की सलाह या चेतावनी को पूरी तरीके से नजरअंदाज कर दिया गया है। बाकायदा यह तर्क दिया गया है कि आक्रमण किए गए या गिराए गए धार्मिक स्थलों के मामले में ‘सत्य की खोज’ की जानी चाहिए।पत्रिका के संपादक प्रफुल्ल केतकर की ओर से लिखे गए संपादकीय में कहा गया है, “सभ्यतागत न्याय की खोज के बारे में बात करने का वक्त आ गया है। बाबा साहेब अंबेडकर ने जाति आधारित भेदभाव की असली वजह को समझा और इसे खत्म करने के लिए कुछ संवैधानिक उपाय हमारे सामने रखे। हमें धार्मिक झगड़ों को समाप्त करने के लिए इसी तरह के दृष्टिकोण की जरूरत है।”

संपादकीय में तर्क दिया गया है कि यह तभी संभव है जब मुस्लिम समुदाय सत्य को स्वीकार करे और अगर यह समुदाय इससे इनकार करता है तो इससे अलगाववाद को बढ़ावा मिलेगा।      द इंडियन एक्सप्रेस ने हाल ही में खबर दी थी कि मुस्लिमों के धार्मिक स्थलों पर हिंदुओं के हक की मांग करते हुए दायर किए गए मुकदमे और देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसे मामलों की बढ़ती संख्या को लेकर संघ परिवार असहज महसूस कर रहा है। खबर में कहा गया था कि संघ के नेताओं को लगता है कि इस तरह के दावों की भरमार वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद या मथुरा ईदगाह पर हिंदू समुदाय के हक और दावे को कमजोर कर देगी। रिपोर्ट में इन मामलों को लेकर संघ परिवार की खामोशी पर भी सवाल उठाया गया था, जबकि इन मामलों से संबंधित याचिकाओं को उसके स्वयंसेवकों के बीच समर्थन मिलने की बात कही गई थी।‘ऐतिहासिक अन्याय’ को स्वीकार करे मुस्लिम समुदाय

ऑर्गेनाइजर की कवर स्टोरी और इसके संपादकीय में कहा गया है कि भारत के मुस्लिम समुदाय के लिए यह जरूरी है कि वह आक्रांताओं द्वारा हिंदुओं के साथ किए गए ‘ऐतिहासिक अन्याय’ को स्वीकार करे।    आर्गेनाइजर ने संपादकीय में कहा है कि सोमनाथ से लेकर संभल और इसके आगे तक सच को जानने की यह लड़ाई धार्मिक श्रेष्ठता के बारे में नहीं है। यह हमारी राष्ट्रीय पहचान को साबित करने और ‘सभ्यतागत न्याय’ के बारे में है। मैगजीन में लिखे गए एक लेख में “ऐतिहासिक घावों को भरने” की बात भी कही गई है।

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