एक समय देवता और दानवों में सौ वर्ष तक घोर युद्ध हुआ। देवताओं के राजा इन्द्र थे और दानवों के महिषासुर। पराक्रमी दानवों द्वारा देवताओं को पराजित कर महिषासुर जब स्वयं इन्द्र बन बैठा, तब सम्पूर्ण देवगण पद्मयोनि ब्रह्माजी को आगे कर भगवान विष्णु और शंकर के पास गये और उन्हें अपनी सम्पूर्ण विपत्ति-गाथा सुनाई।
देवताओं की आर्तवाणी सुनकर भगवान विष्णु तथा शंकर कुपित हो गये और उनकी भृकुटी चढ़ गयी। उनके शरीर से एक महान तेजःपुञ्ज निकला और वह एकत्रित होकर प्रज्वलित पर्वत की तरह सम्पूर्ण दिशाओं को देदीप्यमान करता हुआ नारी-शरीर बन गया।

उस भगवती को देखकर सब देवता प्रसन्न हुए और उसे अपने-अपने शस्त्र समर्पित किये। तब प्रसन्न होकर देवी ने अट्टहास किया, जिससे समस्त दिशाएं गूँज उठीं, समुद्र उछलने लगे, पृथ्वी काँप उठी और पर्वत भी डगमगाने लगे, देवताओं ने जय ध्वनि की और मुनिगण स्तुति करने लगे।
उस भयंकर गर्जना को सुनकर महिषासुर क्रोधित होकर अस्त्र-शस्त्र-सुसज्जित दानव-सेना को लेकर वहाँ आया और तेजःपुञ्ज महालक्ष्मी को उसने देखा। तदनन्तर असुरों का देवी के साथ अति भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें सम्पूर्ण दानव मारे गये।
महिषासुर भी अनेक प्रकार की माया करके थक गया और अन्त में महालक्ष्मी के द्वारा मारा गया। देवताओं ने भगवती की विविध प्रकार से स्तुति की। इस प्रकार महालक्ष्मी ने रूप धारण किया, जिसका स्वरूप और ध्यान इस प्रकार है-
अक्षस्रक्परशुम् गदेषुकुलिशं पद्मम् धनुः कुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टाम् सुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तै: प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्।।
‘स्वहस्तकमल में अक्षमाला, परशु, गदा, बाण, वज्र, कमल, धनुष, कुण्डिका, शक्ति, खड्ग, चर्म, शङ्ख, घण्टा, मधुपात्र, शूल, पाश और सुदर्शनचक्र को धारण करने वाली, कमलस्थित, महिषासुरमर्दिनी महालक्ष्मी का हम ध्यान करते हैं।’
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