राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और नेताजी सुभाष चंद्र बोस

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आने वाले दशहरे के दिन सौ वर्ष का होने जा रहा है, लेकिन इन सौ वर्ष में एक भी राष्ट्रीय स्तर के नेता का निर्माण कर नही सका और राष्ट्रीय स्तर का नेता बनने का सबसे बड़ा मौका भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई थी, जिससे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने आप को अंग्रेजी सत्ताधारी नाराज न हो इसलिए, अलग रखा था . उल्टा अंग्रेजी सेना और पुलिस के के लिए सैनिकों भर्ती करने के काम में लगे हुए रहे हैं यह तथ्य आचार्य विनोबा भावे ने सर्व सेवा संघ की स्थापना बैठक जो महात्मा गांधी की हत्या के बाद सेवाग्राम में 1948 के मार्च में पांच दिनों के लिए हुई थी उस बैठक में विनोबाजी ने आर एस एस के बारे में बोलते हुए यह बात कही थी। लेकिन उसके बावजूद संघ गाहे-बगाहे दावा करते रहता है कि उन्होंने देश की स्वतंत्रता के दौरान पराक्रम पर्व किया है ! जो संपूर्ण झुठ है . इस झुठ का एक नमूना पेश कर रहा हूँ जिससे किसी भी सामान्य पाठक को भी पता चलेगा कि सचमुच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आजादी के आंदोलन में शामिल था या नहीं जिस नेताजी सुभाष चंद्र बोस को आर एस एस के संस्थापक और पहले संघ प्रमुख डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने सुभाषचंद्र बोस को मिलने से मना करने की घटना उस घटना के प्रत्यक्षदर्शियों में से एक प्रमुख व्यक्ति और संघ की संस्थापक पंचायतन में से एक श्री. बालाजी हुद्दार ने खुद इलेस्ट्रेटेड विकली में लिखा हुआ लेख से उजागर किया है। स्वतंत्रता आंदोलन के शहिद हुए शहिदेआजम भगतसिंह को लेकर दावा करता रहता है, संघ को उनके प्रति कैसा आदर है.

और उनके साथ कांग्रेस ने या विशेष रूप से महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू ने कैसा अन्याय किया ? यह बातें संघ की सेफ्रोन डिजिटल आर्मी के द्वारा लगातार प्रचार – प्रसार करने का प्रयास संघ पडदे के पिछे से सतत कर रहा हैं . जिसका पर्दाफ़ाश श्री. बालाजी हुद्दार के इस लेख से साफ हो जाता है। यह प्रसंग 1939 के दौरान नेताजी भारत को स्वतंत्र करने के लिए विदेश जाने के पहले का है. जिसका मुख्य उद्देश्य था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उन्होंने शुरू किया हुआ आई एन ए में शामिल हो. इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन प्रमुख डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से मिलने के लिए की गई कोशिश का यह प्रसंग है . और इस कोशिश को करने वाले बालाजी हुद्दार जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापकों में से एक का कहना था कि “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सिर्फ हिंदू धर्म में की गौरवशाली अतीत के चर्चाओं में व्यस्त रहता है, लेकिन वर्तमान स्वतंत्रता के आंदोलन से तय करते हुए दूर रहता है.” यह देखकर बालाजी हुद्दार ने कहा कि “संघ अपने खुद के ही इर्द – गिर्द घुमने के अलावा कुछ नहीं कर सकता”.

बालाजी हुद्दार ने स्पेन के तानाशाह फ्रॅंको के खिलाफ स्पेन में जाकर, आंतराष्ट्रीय ब्रिगेड के साथ मिलकर लड़ाई में हिस्सा लिया था. और यह बात नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भी मालूम थी. इसलिए नेताजी ने अपनी अलग कोशिश करने के क्रम में, उन्होंने त्रिपुरी कांग्रेस के बाद कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था. और आजाद हिंद फौज की स्थापना करके उसके द्वारा अंग्रेजी राज के खिलाफ डायरेक्ट युद्ध करने की तैयारी शुरू कर दी थी . और उसमे शामिल करने के लिए सबसे पहले भारत में कोशिश शुरू की थी. और इसिलिये वह मुंबई आए हुए थे. और उन्होंने बालासाहब हुद्दार को एक दिन रात के समय मिलने के लिए बुलाया और बालाजी हुद्दार ने देखा कि कोई शाह नाम के सज्जन भी नेताजी के साथ थे, नेताजी ने कहा कि मैने नाशिक में जाकर डॉ. हेडगेवार से मिलकर उनकी और सुभाष बाबु के साथ मुलाकात तय करने के लिए कहा. हेडगेवार उस समय नाशिक में ठहरे हुए थे। इसलिए मैं और शहा मिलकर नाशिक गए,और मै हेडगेवार से मिलने के लिए उनके कमरे में अकेला चला गया, तो देखा कि हेडगेवार अन्य स्वयंसेवकों के साथ हास्य – विनोद कर रहे थे. मैंने स्वयंसेवकों को थोडी देर के लिए बाहर जाने के लिए कहा, और हेडगेवार जी को कहा कि “मैं मुख्य रूप से आपको नेताजी सुभाष चंद्र बोस के कहने पर मिलने आया हूँ. और नेताजी आपसे मिलने के लिए काफी इच्छुक है ,और इसलिए उन्होंने मुझे भेजा है .” तो हेडगेवार बोले कि “मैं बहुत बिमार हूँ ,और मै बोल भी नहीं सकता .इसलिए मैं किसी से भी मिलने के लिए असमर्थ हूँ .” मैंने उन्हें काफी समझाने की कोशिश की “कि कांग्रेस के इतने बड़े नेता को मिलने का मौका गवाना नही चाहिए” तो वह बार-बार अपनी बिमारी का बहाना बता रहे थे. मैंने कहा कि बाहर उनके करीबी शाह नाम के सज्जन खड़े है, कम-से-कम उन्हें यह सब आप खुद बता दिजिए, अन्यथा नेताजी को लगेगा कि यह भेट मैने ही होने नही दी . लेकिन यह बात भी उन्होंने नही मानी और बेडपर सोते हुए अपने उपर चादर ओढ ली, इसलिए मैं मजबुरन बाहर चला आया और जो लोग जो पहले से ही हेडगेवार के साथ हास्य-व्यंग्य कर रहे थे वह उस कमरे के अंदर जाते ही पुनः हास्य – व्यंग्य के फव्वारे फुट रहे थे. और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की यह पहल जर्मनी जाने के पहले की है ।”

क्या इस प्रसंग को पढ़ने के बाद आर एस एस को कोई नैतिक अधिकार है कि वह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल था ? आर एस एस की स्थापना 1925 मे हुई है इसलिए यह वर्ष आर एस एस की शताब्दी मनाने का वर्ष है तो मेरा आर एस एस को विनम्र सुझाव है कि सौ वर्ष की यात्रा कैसे पार की है ? और उस कारण उसे क्या – क्या उपलब्धियां प्राप्त हुई है इसपर ईमानदारी से आत्मचिंतन करे और जब कई आजादी के आंदोलन के सब से बडे दौर (1920-47) में वह जमीन पर खडा हो चुका था और उसने उस समय सचमुच ही क्या योगदान दिया था? इसपर अवश्य मंथन करे क्योंकि आज देशभक्ति का सब से अधिक प्रदर्शन करने वाले संगठनने हमारे देश की आजादी के लिए क्या योगदान दिया है ?

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