देवी माँ के 9 वाहनों का अर्थ
- सिंह-
देवी दुर्गा का वाहन सिंह बल का प्रतीक है माता दुर्गा के उपासक शक्तिशाली होते है और शत्रुओ का सामना करने में समर्थ होते है !
2 – हंस👉 देवी सरस्वती का वाहन हंस है मोती युगना उसकी विशेषता है इन गुणों को अपनाकर ब्रह्म पद पाया जाता है !
3- व्याघ्र👉 यह स्फूर्ति व निरंतर कर्म करने का प्रतीक है अतः माता देवी कुछ विशिष्ट रूपों में बाघ की सवारी करती है !
4 – वर्षभ👉 बैल ब्रह्म चर्य व संयम का प्रतीक है यह बल व सकारात्म ऊर्जा की प्राप्ति करता है इसलिए न केवल भगवती शैलपुत्री अपितु भगवान शिव नंदी की ही सवारी करते है !
5 – गरुड़👉 भगवती लक्ष्मी जब भगवान नारायण के साथ विचरण करती है तो वे विष्णु वाहन गरुड़ पर विराजमान होती है गरुड़ त्याग व वैराग्य के प्रतीक है इन्हें पक्षीयो का राजा माना जाता है !
6 – मयूर👉 भगवान कर्तिकेय की परम शक्ति कर्तिकेय मोर पर विराजित है मोर सौन्दर्य , लावण्य , स्नेह , व योग शक्ति का प्रतीक है !
7 – उल्लू👉 माता लक्ष्मी का वाहन उल्लू आध्यात्मिक दृष्टि से अंघता का प्रतीक है सांसारिक जीवन में लक्ष्मी यानि धन दौलत के पीछे भागने वाला इंसान आत्मज्ञान रूपी सूर्य को नहीं देख पाता है !
8 – गदर्भ👉 यह तमोगुण का प्रतीक है इसलिए भगवती कालरात्रि ने इसे अपने वाहन के रूप में चुना है माता शीतला का वाहन भी गधा ही होता है !
9 – हाथी👉 देवी विभिन्न रूपों में हाथी पर विराजमान होती है अनेक लोकदेवीया हाथी पर बैठती है तंत्र शास्त्र के अनुसार देवी का एक नाम गजलक्ष्मी भी है !
श्रीदुर्गासप्तशती में योग
श्रीदुर्गासप्तशती सनातन धर्म का सर्वमान्य ग्रंथ है, जिसके आधार पर पाठ, परायण मंत्र, शतचंडी जैसे सुप्रसिद्ध अनुष्ठानों में भी इसके पाठ की परंपरा है। विविध कामनाओं की पूर्ति व अनिष्ट-निवारण के लिए दुर्गासप्तशती या चंडी पाठ के कई काम्य प्रयोग होते हैं। मुमुक्षु एवं ज्ञानार्थियों के लिए इसका अपना महत्त्व है, वहीं आर्तभक्तों के लिए तो भगवती का आँचल ही अनन्य शरणस्थली है। इन सबके बावजूद आज दुर्गासप्तशती पूजा-पाठ की पोथी बनकर रह गई है। इसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि, यौगिक विविधता एवं आध्यात्मिक महत्त्व को लेकर अधिकांश सुधीगण अनभिज्ञ हैं।
श्रीदुर्गासप्तशती के प्रथम अध्याय में वैदिक युग, उत्तरवैदिक युग, महाकाव्यकाल, रामायण एवं महाभारतकाल, पौराणिक काल, परवर्तीकाल आदि में की जाने वाली शक्ति-उपासना के विविध पक्षों का विवेचन किया गया। द्वितीय अध्याय ‘ज्ञानयोग’ में यह स्पष्ट किया गया है कि देवी ब्रह्म रूप हैं। जगत इनका मायिक विस्तार है। महामाया कें रूप में देवी ही भगवान विष्णु तक को योग-निद्रा में सुलाए हैं, इनकी दुस्तर माया का पार पाना कठिन है।
श्रीदुर्गासप्तशती में ब्रह्म, जगत, माया जैसी ज्ञानयोग की मूल अवधारणाएँ देवी के इर्द-गिर्द. घूमती हैं। तृतीय अध्याय ‘भक्तियोग’ में भक्ति के विविध तत्वों, यथा-प्रेम, श्रद्धा-विश्वास, समर्पण आदि तत्त्वों का विस्तृत उल्लेख किया गया है, जो श्रीदुर्गासप्तशती के विविध स्थानों में वर्णित है। श्रीदुर्गासप्तशती में समर्पण, विसर्जन और विलय के साथ भक्ति की चरम उपलब्धि का सुंदर वर्णन मिलता है। इस क्रम में राजा सुरथ जहाँ सकाम भक्ति द्वारा अखंड राज्य को प्राप्त करते हैं, वहीं समाधि वैश्य निष्काम भक्ति द्वारा उपर्युक्त वर्णित क्रम में विवेक-वैराग्य में प्रतिष्ठित होते हुए अंततः परमात्मा को प्राप्त होते हैं; अर्थात मोक्ष को प्राप्त करते हैं।
चतुर्थ अध्याय ‘कुंडलिनी योग’ में श्रीदुर्गासप्तशती के विविध अध्यायों में छिपे हुए कुंडलिनी के विविध पक्षों, रूपकों एवं अलंकारों का वर्णन किया गया है। कुंडलिनी जागरण का प्रथम रूप प्राणोत्थान माना गया है और दूसरा रूप प्रकाशमयी अवस्था की प्राप्ति है।
श्रीदुर्गासप्तशती में कुंडलिनी जागरण की जिस विधि का सूक्ष्म विवेचन मिलता है, उसमें यह मूलाधार से जागते हुए प्राणोत्थान के साथ वासना का रूपांतरण करती हुई मणिपूर और अनाहत को पार करती हुई आज्ञाचक्र से आगे प्रकाशमय अवस्था की ओर बढ़ती है और सहस्रारचक्र में ज्ञान और आनंद की पूर्णावस्था में प्रतिष्ठित होती है। श्रीदुर्गासप्तशती में सीधे-सीधे इन चक्रों का वर्णन तो नहीं मिलता, किंतु इनके जागरण एवं विकास ‘की समानुकूल भाव की अवस्थाओं का कूट वर्णन स्पष्ट रूप से हृदयंगम किया जा सकता है।
पंचम अध्याय “मंत्रयोग’ में श्रीदुर्गासप्तशती के प्रत्येक श्लोक को मंत्रमय माना है और मंत्र का प्रकार मालामंत्र के रूप में स्वीकारा गया है। बीजमंत्र भी इसमें यत्र-तत्र बिखरे मिलते हैं। वस्तुत: दुर्गासप्तशती को मांत्रिक ग्रंथ कहा गया है। इसमें विनियोग के पाँच अंग–ऋषि, छंद, देवता, बीज और तत्त्व के बिना मंत्र को अधूरा माना गया है। इन पाँचों अंगों के प्रयोग से ही मंत्रशक्ति के सभी आयाम खुलते हैं। इस तरह श्रीदुर्गासप्तशती के तीनों चरित्रों का विनियोग जीवन के समग्र उत्कर्ष एवं उन्नयन को ध्यान में रखकर किया गया है, जिसमें क्रमशः तमस्, रजस् और सत्त्व के जागरण, स्थापन और परिशोधन के साथ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चारों पुरुषार्थों की सिद्धि सुनिश्चित होती है।
छठवें अध्याय में ‘ श्रीदुर्गासप्तशती के पाठ एवं मंद्रणप के मनोवैज्ञानिक प्रभावों को जानने के लिए प्रयोगात्मक अध्ययन’ पर बल दिया गया है एक महीने तक विनियोग एवं न्यास विधि के साथ ११ माला नवार्ण मं जप तथा नवार्ण मंत्र संपुटित सप्तश्लोकी दुर्गा पाठ इस कार्य के सिद्ध होने पर, एक माला नवार्ण मंत्र, फिर पाठ एवं अंत में पुन: एक माला नवार्ण मंत्र का पाठ करना चाहिए । जिससे चिंता, अवसाद, अपराधबोध, थकान, प्रतिगमन, बहिर्मुखता, उत्तेजना एवं तनाव का नाश होता है, इस पाठ से बहिर्मुखता के अतिरिक्त सातों मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं के स्तरों में सार्थक कमी पाई गई एवं बहिर्मुखता में
सार्थक वृद्धि देखी गई।
रात्रिसूक्त मंत्र पाठ से उच्च रक्तचाप से मुक्ति प्राप्त होती है। प्रयोग में शामिल व्यक्तियों के चिंता स्तर में सार्थक कमी एवं भावनात्मक परिपक्वता स्तर में वृद्धि देखी गई तथा उच्च रक्तचाप के व्यक्तियों में सिस्टोलिक एवं डायस्टोलिक स्तर में सार्थक रूप से कमी पाई गई।
श्रीदुर्गासप्तशती के अंतर्गत किए गए उपर्युक्त प्रयोग यह सिद्ध करते हैं कि इस पुस्तिका में कई ऐसे रहस्य भरे पड़े हैं, जिनसे जनसामान्य अनभिज्ञ है। यदि इसके महत्त्व को समझकर निष्काम भाव से देवी की आराधना की जाए तो व्यक्ति इसके अद्भुत परिणामों को स्वयं अनुभव कर सकता है
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