जितिया व्रत, जिसे जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है, एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है जो मुख्य रूप से माताओं द्वारा अपने बच्चों की लंबी उम्र और समृद्धि के लिए मनाया जाता है। इस वर्ष, जितिया व्रत 25 सितंबर 2024 को मनाया जाएगा।
जितिया व्रत के प्रमुख अनुष्ठान:
- सुबह जल्दी स्नान और सफाई: महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और पूजा स्थल को साफ करती हैं।
- सूर्य देव को जल अर्पण: दिन की शुरुआत सूर्य देव को जल (अर्घ्य) अर्पित करने से होती है, जिससे आशीर्वाद और समृद्धि प्राप्त होती है।
- जिमुतवाहन की पूजा: जिमुतवाहन की मूर्ति या चित्र स्थापित किया जाता है और फूल, अक्षत, और अन्य पवित्र सामग्री अर्पित की जाती है।
- निर्जला व्रत: महिलाएं पूरे दिन बिना पानी के व्रत रखती हैं और अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत तोड़ती हैं।
जितिया व्रत की कथा:
प्राचीन समय में, एक राजा था जिसका नाम जिमुतवाहन था। वह बहुत ही दयालु और धर्मात्मा राजा था। उसने अपने राज्य को अपने भाइयों को सौंप दिया और खुद जंगल में रहने चला गया। जंगल में रहते हुए, उसने एक दिन एक महिला को देखा जो बहुत दुखी थी। जब उसने महिला से उसके दुख का कारण पूछा, तो उसने बताया कि वह नागवंश की है और उसे अपने बेटे को गरुड़ को बलिदान के रूप में देना होगा।
गरुड़, जो एक पौराणिक पक्षी था, नागवंश के लोगों से बलिदान के रूप में उनके बच्चों को मांगता था। यह सुनकर जिमुतवाहन ने उस महिला की मदद करने का निर्णय लिया। उसने महिला से कहा कि वह उसके बेटे की जगह खुद को गरुड़ के सामने प्रस्तुत करेगा।
जिमुतवाहन ने गरुड़ के सामने जाकर कहा कि वह खुद को बलिदान के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। गरुड़, जिमुतवाहन की मानवता और साहस से बहुत प्रभावित हुआ। उसने जिमुतवाहन से पूछा कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। जिमुतवाहन ने गरुड़ को बताया कि वह एक राजा है और उसने अपने राज्य को त्याग कर जंगल में रहने का निर्णय लिया है। वह नहीं चाहता कि किसी भी निर्दोष बच्चे को बलिदान के रूप में दिया जाए।
गरुड़, जिमुतवाहन की बातों से बहुत प्रभावित हुआ और उसने नागवंश के लोगों से बलिदान लेना बंद कर दिया। उसने जिमुतवाहन को आशीर्वाद दिया और कहा कि वह हमेशा उसकी मानवता और साहस को याद रखेगा।
इस प्रकार, जितिया व्रत की कथा हमें सिखाती है कि मानवता, साहस और त्याग का महत्व क्या है। यह व्रत माताओं द्वारा अपने बच्चों की लंबी उम्र और समृद्धि के लिए मनाया जाता है, और यह कथा इस व्रत के पीछे की धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं को दर्शाती है।
जितिया व्रत का महत्व:
- मातृत्व का सम्मान: यह व्रत मातृत्व के महत्व को दर्शाता है और माताओं के अपने बच्चों के प्रति असीम प्रेम, समर्पण और त्याग को प्रकट करता है।
- संस्कृति और परंपरा: यह व्रत सांस्कृतिक धरोहर और पारंपरिक मूल्यों को बनाए रखने में मदद करता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां इसे व्यापक रूप से मनाया जाता है।
- धार्मिक आस्था: जितिया व्रत धार्मिक आस्था और विश्वास का प्रतीक है। महिलाएं भगवान जिमुतवाहन और सूर्य देव की पूजा करती हैं और उनसे अपने बच्चों की सुरक्षा और समृद्धि की कामना करती हैं।
- समुदायिक एकता: इस व्रत के दौरान महिलाएं एकत्रित होकर पूजा करती हैं, जिससे समुदाय में एकता और सहयोग की भावना बढ़ती है।
जितिया व्रत के प्रमुख प्रस्थान-प्रस्थान:
- तीन दिवसीय उत्सव: जितिया व्रत तीन दिनों तक मनाया जाता है। यह अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी से नवमी तक चलता है।
- बच्चों की सुरक्षा और समृद्धि: माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र और समृद्धि के लिए यह व्रत रखती हैं।
- पारिवारिक बंधन: यह व्रत परिवार के सदस्यों के बीच बंधन को मजबूत करता है और परिवार में शांति और समृद्धि लाता है।
- आध्यात्मिक विकास: यह व्रत आध्यात्मिक विकास और आत्म-संयम को बढ़ावा देता है, जिससे व्यक्ति की आस्था और विश्वास में वृद्धि होती है।
![]()
Discover more from जन विचार
Subscribe to get the latest posts sent to your email.




