*सच दिखाने का सलीका : फोटो पत्रकारिता पर हुआ गहन विमर्श* 

राजकमल प्रकाशन समूह के आयोजन “किताब उत्सव” के अंतर्गत रविवार 7 सितंबर को हिंदी भवन, भोपाल में “सच दिखाने का सलीका : फोटो पत्रकारिता” विषय पर एक विशेष परिचर्चा आयोजित की गई। इसमें पत्रकारिता और साहित्य जगत के प्रतिष्ठित वक्ताओं ने भाग लिया।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध मीडिया प्राध्यापक डॉ. धनंजय चोपड़ा ने कहा कि आज का समय “विजुअल एक्सप्लोजन” का है, जब हर कोई अपने-अपने तरीके से फोटोग्राफर बन गया है। अब चित्र में शब्द भी समाहित होने लगे हैं। चित्रों के साथ शब्द खींचे जा रहे हैं। अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि पत्रकारिता में नुज़ूमी (दूरदर्शी) होना और कभी-कभी ज्योतिषी जैसी सूझबूझ रखना बहुत आवश्यक है। नेता का आगमन हो या कोई त्रासदी एक पत्रकार को मौके पर रहकर एक्शन फोटोग्राफ्स लाना चाहिए। उन्होंने याद किया कि किस प्रकार एक बड़े दंगे की रिपोर्टिंग के दौरान 52 तस्वीरें एक ही अंक में प्रकाशित की गईं, जिससे अखबार की बिक्री अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई। उस दिन अखबार ब्लैक में बिक रहा था क्योंकि दंगे में जिन लोगों की दुकानें जलीं थी, वे बीमा क्लेम के दावे के लिए अखबार खरीद रहे थे।

इस अवसर पर पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि इतिहास को समझे बिना वर्तमान की फोटो पत्रकारिता को समझना संभव नहीं है। उन्होंने 1950 के दशक में हुए कुंभ का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया कि त्रासदियों और आंदोलनों के समय में किस तरह फोटो पत्रकारिता ने प्रशासन को जवाबदेह बनाया और समाज पर गहरा प्रभाव डाला। डॉ. धनंजय चोपड़ा की पुस्तक “फोटो पत्रकारिता – बदलती दुनिया बदलती तकनीक” के सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि यह एक अच्छी किताब है सभी फोटो जर्नलिस्ट्स के लिए। फोटो में कैमरे का इतना महत्व नहीं है जितना एंगल का है। तस्वीर खींचने का कौशल केवल कैमरे पर नहीं, बल्कि दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।

कार्यक्रम में प्रो. संजय द्विवेदी, डॉ. पवित्र श्रीवास्तव ने भी विचार व्यक्त किए। साथ ही माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल सहित अनेक गणमान्य नागरिक, प्राध्यापक, विद्यार्थी और साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन तसनीफ़ हैदर ने किया।

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