आरिफ़ मोहम्मद ख़ान का चुनाव से पहले बिहार का राज्यपाल बनना क्या किसी के लिए फ़ायदेमंद होगा?

आरिफ़ मोहम्मद ख़ान बिहार के नए राज्यपाल नियुक्त हुए हैं। वहीं, राज्य के वर्तमान राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ आर्लेकर को केरल का राज्यपाल बनाया गया है।

आरिफ़ मोहम्मद ख़ान इससे पहले सितंबर 2019 से केरल के राज्यपाल थे. वहीं, राजेन्द्र विश्वनाथ आर्लेकर फ़रवरी 2023 से बिहार के राज्यपाल थे। राज्य में 26 साल बाद किसी मुस्लिम राज्यपाल की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।

ऐसे में आरिफ़ मोहम्मद ख़ान की नियुक्ति के कई सियासी मतलब निकाले जा रहे हैं।

* आरिफ़ मोहम्मद ख़ान की नियुक्ति के मायने

भारत में राज्यपालों की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति करते हैं. राज्यपाल राज्य के संवैधानिक प्रमुख होते हैं।   केरल में कई मुद्दों पर आरिफ़ मोहम्मद ख़ान और सत्ताधारी गठबंधन एलडीएफ़ के बीच गतिरोध का माहौल रहा। भारत में लंबे समय से राज्यपालों पर राजनीतिक पक्षपात और केंद्र सरकार के इशारे पर काम करने के आरोप लगते रहे हैं. राज्य में चुनाव के दौरान अगर किसी राजनीतिक संकट जैसी स्थिति आती है और पार्टियों के बीच सरकार बनाने की स्थिति साफ़ नहीं होती तब राज्यपाल तय कर सकते हैं कि कौन सी पार्टी सरकार बनाने के लिए सबसे अच्छी स्थिति में है।

राजनीतिक उठापटक के बीच राज्यपाल की भूमिका के सवाल पर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के पूर्व प्रोफ़ेसर पुष्पेन्द्र कहते हैं, “राजनीतिक उठापटक में राज्यपाल की भूमिका अहम होती है. बिहार जीतने के लक्ष्य और नीतीश कुमार को किनारे करने के लिए बीजेपी सही समय का इंतज़ार कर रही है. राज्यपाल के तौर पर आरिफ़ मोहम्मद ख़ान साहब की नियुक्ति इस लक्ष्य की तरफ़ बढ़ते क़दमों में से एक है.”       ऐसे में ये सवाल उठता है कि आख़िर आरिफ़ मोहम्मद ख़ान की नियुक्ति राजनीति में ‘टॉकिंग प्वाइंट’ क्यों बनी है? क्या इससे मुस्लिम समुदाय की वोटिंग पर असर पड़ेगा? क्या आने वाले दिनों में केरल जैसी कोई दुविधा से बिहार को गुज़रना पड़ सकता है?

राजनीतिक विश्लेषक हिलाल अहमद ने कहा, “राज्यपाल अब सिर्फ़ संवैधानिक पद नहीं रहा बल्कि उसे सक्रिय रूप में काम करना पड़ता है. बिहार की बात करें तो यहां मुस्लिम वोटरों में एक बिखराव भी है. मक़सद है कि इस नियुक्ति के ज़रिए मुस्लिम वोट में बिखराव का फ़ायदा नीतीश कुमार की जेडीयू को मिले. साथ ही आगामी चुनाव में अगर त्रिशंकु सरकार की स्थिति बनेगी तो उसमें राज्यपाल की अहम भूमिका हो जाएगी।” ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ के संस्थापक और पूर्व सांसद अली अनवर कहते हैं, “बीजेपी कई निशाने एक साथ लगा रही है. मुसलमान वोटरों को आकर्षित करना, नीतीश कुमार को बांधे रखना और चुनाव में महागठबंधन की सरकार बन जाए तो केरल की तरह ही उसकी नाक में दम करके समानांतर सरकार चलाना।”

* क्या मुस्लिम वोटों पर असर पड़ेगा?

आरिफ़ मोहम्मद ख़ान की नियुक्ति को मुस्लिम मतदाताओं को अपने पक्ष में लुभाने के मक़सद के तौर पर देखा जा रहा है। जातीय जनगणना के मुताबिक़, बिहार में 17.78 फ़ीसदी लोग मुस्लिम समुदाय से आते हैं और मुस्लिम समुदाय की कुल आबादी में पसमांदा मुस्लिम 73 प्रतिशत हैं. ज़ाहिर तौर पर इस वोट बैंक को सभी पार्टियां अपने पाले में करना चाहती हैं। प्रोफ़ेसर पुष्पेन्द्र इस पर कहते हैं, “बीजेपी की अपनी छवि मुस्लिम विरोधी की है, लेकिन उसके गठबंधन साथी जेडीयू, लोजपा और अन्य दलों की छवि मुस्लिम विरोधी नहीं है। यानी आरिफ़ मोहम्मद ख़ान के आने का फ़ायदा चुनावी गणित में बीजेपी को अप्रत्यक्ष तौर पर मिल सकता है।”

दिलचस्प ये है कि बीते कुछ महीनों में मुस्लिम वोट बैंक बिहार की राजनीति के केंद्र में रहा है. पहले जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की मुस्लिम नेताओं के बीच बढ़ी सक्रियता ने राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और जेडीयू को बेचैन कर दिया. बाद में जेडीयू के कई नेताओं ने ये सार्वजनिक बयान दिया कि मुसलमान जेडीयू को वोट नहीं करते।

ऐसे में राज्य में 26 साल बाद किसी मुस्लिम राज्यपाल की नियुक्ति एमवाई (मुस्लिम यादव) समीकरण के आधार वाली पार्टी आरजेडी के लिए क्या चुनौती साबित होगी?

डॉ. अख़लाक़-उर -रहमान किदवई 14 अगस्त 1993 से 26 अप्रैल 1998 तक बिहार के राज्यपाल रहे।आरजेडी के प्रदेश प्रवक्ता एजाज़ अहमद इससे इनकार करते हैं।

वो कहते है, “नई नियुक्ति तो बीजेपी का राजनीतिक हथियार है. उच्च शिक्षा को लेकर जो टकराव की स्थिति बनी रहती थी और हाल के दिनों में बीजेपी ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने को लेकर जो असमंजस की स्थिति बनाई, उससे ध्यान भटकाने के लिए ये फ़ैसला लिया गया है।”

* सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया है – बीजेपी

वहीं, इस सवाल पर जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार कहते हैं, “नीतीश कुमार का ट्रैक रिकॉर्ड रहा है कि उन्होंने कभी किसी संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं किया। हमारी सरकार तो मुसलमानों की तालीम से लेकर परित्यक्त नारी तक पर योजनाएं चला रही है. जेडीयू के काम पर मुसलमान उन्हें वोट देते हैं।”

प्रदेश बीजेपी के प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने इसे सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया क़रार दिया। वो कहते हैं, “बिहार के लिए तो अच्छी बात है कि उसे एक विद्वान राज्यपाल मिला. इसे दूसरे किसी राजनीतिक चश्मे से देखे जाने की ज़रूरत नहीं है।” लेकिन अपने बयानों के लिए सुर्खियों में बने रहने वाले आरिफ़ मोहम्मद ख़ान की नियुक्ति को ‘सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया’ से कहीं आगे की चीज़ बताया जा रहा है।

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